पापा की कली 

बचपन से पापा की कली रही हूँ 

माँ के लाङ और दुलार में पली बढी हूँ 

अभी सब पर अपना हुक्म चलाती हूँ 

छोटी छोटी बातो पर घर में ऊधम मचाती हूँ 

दोस्तो के साथ कहीं भी बाहर जाती हूँ 

किसी की बंदिशो में ना बांधी जाती हूँ 

कुछ समय बाद समां ही अलग होगा 

जहाँ खेली कूदी वही आँगन छोङकर जाना होगा 

एक हमसफर के साथ उसके घर जाना होगा 

उसके परिवार को अपनाना होगा 

इस एहसास से अक्सर सहम सी जाती हूँ 

थोङा सा रोकर फिर से मुस्कुराती हूँ 

छोङो ये सब बातें वर्तमान में लौट आती हूँ।

-आस्था गंगवार 

Bachpan se papa ki kali rhi hu 

Ma ke laad aur dular me pali bdhi hu 

Abi sb pr apna hukm chlati hu 

Choti choti bato pr ghr me oodham mchati hu 

Dosto ke sath khi b bahr jati hu 

Kisi ki bandisho me na bandhi jati hu 

Kuch samay bad sama hi alg hoga 

Jaha kheli koodi wahi angan chhodkr jana hoga 

Ek hmsafar ke saath uske ghr jana hoga 

Uske privar ko apnana hoga 

Is ahsas se aksar saham si jati hu 

Thoda sa rokr fir se muskurati hu 

Chhodo ye sb bate wartman me laut ati hu. 

-Astha gangwar 


Astha gangwar द्वारा प्रकाशित

its me astha gangwar . I m founder of this blog. I love to write poems... I m a student of msc to chemical science.... read my poems on facebook - https://www.facebook.com/asthagangwarpoetries/ follow me on - I'm on Instagram as @aastha_gangwar_writing_soul

2 विचार “पापा की कली &rdquo पर;

  1. जी बिल्कुल| वर्तमान में लौट आना ही सर्वोचित है| क्योंकि कुछ विचार हमें अक्सर विचलित कर के छोड़ देते हैं|
    और आस्था, आपकी कवितायें काफ़ी अच्छी हैं| आप ऐसे ही आगे बढ़ती रहें, मैं इसकी कामना करता हूँ| 🙂

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