तुम आओ तो
इस बार लौट कर मत जाना।
मन के बगीचे में हरियाली तुम्ही से
खिले फूलों को फिर से नहीं है मुरझाना।
तुम बिन हर एक क्षण है पतझड़
अकेले तुम बिन अब नहीं है एक पल बिताना।
तुम आओ तो
इस बार लौट कर मत जाना।
तुम बिन हाल एेसा जैसे पानी बिन मछली का
ठीक नहीं ऐसे अपनी प्रिये को तङ़पाना।
मेरे साँसों की नाजुक डोर बँधी तुमसे
अब कठिन है स्वयं को तुमसे दूर रख पाना।
तुम आओ तो
इस बार लौट कर मत जाना।

-आस्था गंगवार©

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प्रेम की डोरी से बँधा रिश्ता छुईमुई के पौधे के समान है जिसे छूने भर से वह मुरझा जाता है परन्तु कुछ समय बाद पुनः खिल उठता है। ठीक वैसे ही क्षण भर की नोंक-झोंक के स्पर्श मात्र से मन मुरझा जाता है और हजारों नकारात्मक विचार हृदयों के बीच एक बर्फ का पहाड़ खड़ा कर देते हैं मगर कुछ समय बाद आत्मा मे बसे प्रेम की गर्माहट से वह पहाड़ पिघल जाता है और चंचल मन समस्त नकारात्मक भावों को भूल जाता है। प्रगाढ़ प्रेम से ओत-प्रोत बंधन पुनः खिल उठता है।

जिस क्षण तुम मुझे स्वयं से अलग करो,
वह मेरे जीवन का अन्तिम क्षण हो।
न चाह रहे फिर कुछ पाने की,
मृत्यु पार भी सिर्फ तुम ही तुम हो।

विलग होकर तुमसे मिले अमरता,
हँसकर वह भी मुझे अस्वीकार हो।
या दे ईश्वर सारा जग मुझको तुम बिन,
कोई स्वार्थ कभी न तुमसे बढ़कर हो।

प्रेम में तुम पर मेरा सब न्योछावर,
तुम्हारी पीड़ा पहले मुझको हासिल हो।
कभी न तुम तक पहुंच सके कोई दुख,
बस तुम्हारी मुस्कान हो मेरा जीवन हो।

-आस्था गंगवार ©

शिक्षा, शिक्षा रहीं नहीं,
व्यापार बना अब डाला है।
मंदिर कहलाता था विद्यालय,
अब वहाँ स्वार्थ ने बागडोर संभाला है।

व्यवहारिक शिक्षा का पतन हुआ,
संस्कार जीवन में कैसे आयेंगे।
रटने की पद्धति का जमाना है,
नवाचार कैसे कर पायेंगे।

साधन नहीं बढ़कर जीवनमूल्य से,
सिखलाने वाला गुरु अब रहा नहीं।
माँ भी दूसरों से जीतना सिखाती है अब,
स्वयं से कैसे जीतें बतलाने वाला कोई मिला नहीं।

मनुष्य जीवन हो जायेगा नष्ट,
जाकर महापुरुषों से ही कुछ सीख लो।
मानवता से बड़ा नहीं कोई धर्म जग में,
जीवन मिला परमार्थ को महत्व अब समझ लो ।
कवियित्री -आस्था गंगवार ©

मेरे अन्दर की लेखिका,

मुझे जला रही है।

कई बार बैठे हुए ,सोते हुए

यूँ लगता है

जैसे फिर कोई दामिनी,

मुझे पुकार रही है।

कहने को कुछ ,

कलम विवश हो जैसे ।

शब्द स्तब्ध है ,

सहमे हुए है ऐसे।

कागज भी शर्मिंदा है ,

स्वयं पर आवरण ओढ़कर ।

न्याय क्यों मौन है अब भी,

पापियों का नंगापन देखकर।

कृत्य घिनौने करते समय,

क्यों अधर्मी ईश्वर से नहीं डरते।

आत्मा को कलंकित करते समय,

मंदिर परिसर को भी नहीं छोङ़ते।

राजनीति के नाम पर न जाने कितनी असीफा की,

हर दिन बलि चढ़ती रहेगी ।

कब तक समाज तमाशा देखेगा,

कब तक अदालत बलात्कारियों को बरी करती रहेगी।

देश में हमारे न्याय पर ही ,

बङ़ा प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है ।

क्यों कह रही हूं ऐसा?

क्योंकि बेटी के लिए आवाज उठाने वाले पिता का थाने में कत्ल हुआ है।

कवियित्री -आस्था गंगवार

तुम्हारी ख्वाहिशों की तलब कुछ यूं लगी

अपनी फरमाइशों को दिल में ही दबा लिया

तुम्हारे पीछे कई दफा फूट कर रो लिये

सामने खामोशी से हर गम को छुपा लिया ।

-आस्था गंगवार

बेफिक्र हो चली थी। 

बेफिक्र हो चली थी ज्योंही तुम्हारा काँधा मिला था 

शाम ढलते ढलते तुम्हारे मेरे रास्ते बदल गये थे 

समझा लिया था दिल को उज्ज्वल भविष्य की आशा में 

सच कहती हूँ प्रियवर लौटते हुए हजार टुकड़े हुए थे 

जीवन में एक पल को अँधेरा होने लगा था 

पर सुकुन था एक दिन में महीनों के लम्हे जी लिए थे 

थामकर हाथ तुम्हारा छोड़ने का मन तो नही था 

फिर मिलेंगे ये सोचकर हम दोनो तसल्ली कर लिये थे 

घर को लौट आयी थी लेकर तुम्हारी खुश्बू 

तुम्हारे दिये हुए सभी खत आज कई दफा पढ़ लिये थे 

बार बार अपनी नादानियों को कोस रही थी 

कुछ कीमती लम्हे तुमसे नाराजगी में गवा दिये थे 

सोच रही थी काश पूरा जीवन यूँ ही बीत जाता 

फिर समाज और परिवार के कर्तव्य के ख्याल ने सब जबाब दे दिये थे। 

      -आस्था गंगवार © 

एक बार सेहर में लबों से मेरा नाम कह देते, 

रात तो मुकम्मल हो ही गयी थी दिन भी मुकम्मल हो जाता। 

    आस्था गंगवार © 

दुनिया बहुत बड़ी है यहाँ किसी को किसी की परवाह नहीं है इसलिए कम से कम उनसे नफरत, शिकायत मत रखो जिनको तुम्हारी परवाह है। 

    -आस्था गंगवार ©