एक कवि की संवेदना। 

एक कवि की संवेदना 

जो है सीमा से परे 

दूसरों की पीङा में भी 

अपने दर्द से रहते हैं जुड़े 

सामान्य परिस्थिति को भी 

असाधारण नजरिये से देखते 

जो कोई नहीं देख पाता 

वो दृश्य कविता बनकर उभरते 

हर लम्हे को थामकर कागज पर 

शब्द बनाकर कैद करते 

भावनाओं के संसार में खोकर 

जीवन का नया अनुभव करते 

प्रकृति के हर सौन्दर्य में 

काव्य रस नजर आता 

संसारिक जीवन से विलग 

अपना काल्पनिक संसार भाता। 

    -आस्था गंगवार © 

जब से तुम मिले हो। 

जब से तुम मिले हो 

हम हम न रहे हैं 

ये साँसे भी तुम्हारी है 

और धङ़क भी तुम रहे हो। 


बैठे-बैठे खो जाती हूँ 

तुम में ही गुम हो जाती हूँ 

अपनी तो कुछ खबर नहीं 

हर जगह तुम ही मिल रहे हो। 


तुम्हें ढूंढते हैं हर आहट में 

अपनी ही किसी मुस्कुराहट में 

कहने को तो अधर हमारे है 

पर मुस्कुरा तुम रहे हो। 


हवा के इन मादक झोंको से 

जब भी जुल्फ मेरी लहराती है 

लगता है दूर कहीं से तुम 

बयार बनकर स्पर्श कर रहे हो। 


डराती है जब भी तन्हाइयाँ 

भागती हूँ हकीकत से 

रूबरू कराती है तुम्हारी यादें 

कि तुम साथ चल रहे हो। 

    -आस्था गंगवार © 

शब्दों का पर्याय 

शब्दों का पर्याय नहीं मालूम, 

और कविता लिख रहे हैं। 


कविता है दर्पण अन्तर्मन का, 

लिखकर अब भावनाओं से मुकर रहे हैं। 


अगर काव्य शब्द मिथ्या है, 

तब क्यों बार-बार ये गुनाह कर रहे हैं। 


जब ह्दय में भावना कुछ और है, 

तब क्यों शब्द कुछ और कह रहे हैं। 

   -आस्था गंगवार © 

चलो बैठने चलते हैं…. 

चलो बैठने चलते हैं 

कहीं समुन्दर किनारे 

कोई नई कहानी ढूंढ़ेगें 

कोई नया एहसास लिखेंगे 

वहाँ की आती जाती लहरों से 

कुछ अनकही बातें करेंगे 

वो मेरी आँखें पढ़ लेगा 

मैं उसके इशारे समझ लूंगी 

जब वहाँ के जर्रे-जर्रे से 

मुलाकात पूरी हो जाएगी 

तो फिर चलेंगे 

किसी खण्डहर किनारे 

पढ़ेंगे उसकी खामोशी 

हर टीले में छुपी उदासी 

जो कहना चाहता है अपनी बात 

खुद में छुपे इतिहास का राज 

जहाँ सदियो पहले थी चहल-पहल 

अब वहाँ आते है टूटे हुये दिल 

या जो है जिन्दगी से नाराज 

या मुझ जैसे जो ढ़ूढ़ते है एकांतवास 

जब वहाँ के जर्रे-जर्रे से 

मुलाकात पूरी हो जाएगी 

तो फिर घर लौट चलेंगे। 

    -आस्था गंगवार © 


देखकर सामने तुमको…. 

देखकर सामने तुमको 

हम जमाना भूल जाते है 

एक बस तुम याद रहते हो 

बाकी सब फसाना भूल जाते है। 


सोचकर आये थे 

थोड़ा नाराज हो लेंगे 

देखकर सामने तुमको 

सब शिकायत भूल जाते है। 


एक बस साथ तुम देना 

खुशी गम सब सह लेंगे 

जबसे चुना है हमसफर तुमको 

किसी और को देखने से कतराते है। 


बन गये हो जिन्दगी मेरी 

तुमको खोने के ख्याल से डर जाते है 

रखे सलामत रब तुझे 

हर घड़ी मन में यही दोहराते है। 

       -आस्था गंगवार © 

ओ मेरे मनमोहना… 

ओ मेरे मनमोहना 

तुम बिन जाऊँ कहाँ 

रास न आये कोई बगिया 

न ही भायें प्यारी सखियां 

जमुना से है हाल भये 

बरसों बीते दरस किये 

आ जाओ श्याम रास रचैया 

पार लगाओ मन की नैया 

तुम बिन कटे न मेरी रैना 

आये न एक पल भी अब चैना 

विरह की दूरी सही न जाये 

अखियां भी कब तक नीर बहाये 

प्रेम है तुमसे कितना कान्हा 

कठिन है शब्दों से परिभाषित कर पाना 

प्रीत में बरसों बरस मैं ऐसे जी लूंगी 

तुम्हारी थी मैं सदा तुम्हारी ही रहूँगी। 

     -आस्था गंगवार © 

दीवारें। 

चारों तरफ दीवारे 

जिनमें मैं कैद हूँ भी और नहीं भी 

दिन निकलता है 

दिन ढलता है 

लम्हे बीतते है 

चेहरों से पाला पङता है 

मगर नजरें दीवारों से टकराती है 

जब उदास होने लगती हूँ 

तो ये दीवारें टिकने को सहारा देती है 

जब दम घुटने लगता है 

तो रोशनदान से आती रोशनी सुकून देती है 

गुम होकर भी गुमशुम नहीं इस बंद शहर में 

इन दीवारों में जिन्दगी है भी और नहीं भी। 

    -आस्था गंगवार © 

अब ये पंछी कहाँ रहेगे। 

अब ये पंछी कहाँ रहेगे 

मधुवन की तलाश में कहाँ फिरेंगे 

तिनका-तिनका जोङ जोङकर 

उसने अपना महल बनाया 

एक वृक्ष की शाखा तले 

फिर उसको लटकाया 

बिन आंधी तूफान के 

उनके घरौंदे तोङो ना 

मतवारे इन पंछी को 

पिंजरे में पकङो ना 

उनके नाजुक पंखो को 

जंजीरों में जकङो ना 

उन्मुक्त गगन में हर्ष से 

स्वछंद विचरने दो ना 

उनकी छोटी सी दुनिया में 

उनको थोड़ा खुश रहने दो ना। 

   -आस्था गंगवार © 

हवा के झोंके संग। 

हवा के झोंके संग 

खेलती, अठखेलियां करती 

लहराये जब जब पताका 

लगे ऐसे मुझे जैसे 

लहराता हो मेरा मन। 


सुनकर मधुर संगीत 

झंकृत होते झोंको की धुन पर 

मुस्कुराये कलियाँ, फूल 

शाखाएं, पर्ण डोले ऐसे 

जैसे डोलता हो मेरा मन। 


गगन भी खुशी से 

नीला सफेद हुआ जाये 

ढलती शाम के झरोखे में 

बादलों के सैर करते टुकड़े 

उन टुकड़ों की ओट से 

शर्मीला चाँद झांके ऐसे 

जैसे झाँकता हो मेरा मन। 


चहकते, गाते संगीतमय 

पंछियो के झुंड 

लौटते अपने बसेरों को 

केसरिया बदरी के 

बीच से गुजरते ऐसे 

जैसे गुजरता हो मेरा मन। 

    -आस्था गंगवार © 

दो पल का गुस्सा। 

दो पल का गुस्सा 

तेरे लिए बसी बेइंतहा 

मोहब्बत के तले 

दब जाता है। 


करना भी चाहूँ 

तेरे खिलाफ बेरूखी 

सीने में धङकता तेरा दिल 

इसकी इजाजत नहीं दे पाता है।


जाऊं भी तो किधर 

तुझसे रूठकर के 

तुझसे एक पल की दूरी में 

कहीं भी सुकून नहीं आता है। 

    -आस्था गंगवार ©