जहां से होकर के गुजरी थी ।

जहां से होकर के गुजरी थी,  वहीं आकर खङी हो जाती हूँ । कदम भी थकते नहीं है,  बस खामोश हो जाती हूँ । भागती हूँ जिस हकीकत से,  बार-बार उसी से टकराती हूँ । देखती हूँ खुद को आयने में,  लगता है कुछ तलाशती हूँ। समझती हूँ जिन्दगी को,  खुद को भी समझाती हूँपढ़ना जारी रखें “जहां से होकर के गुजरी थी ।”

दो पल का गुस्सा। 

दो पल का गुस्सा  तेरे लिए बसी बेइंतहा  मोहब्बत के तले  दब जाता है।  करना भी चाहूँ  तेरे खिलाफ बेरूखी  सीने में धङकता तेरा दिल  इसकी इजाजत नहीं दे पाता है। जाऊं भी तो किधर  तुझसे रूठकर के  तुझसे एक पल की दूरी में  कहीं भी सुकून नहीं आता है।      -आस्था गंगवार ©