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जब तलक चोट न लगे। 

जब तलक चोट न लगे,  मन गान नहीं करता।  कलम प्यासी है लिखने को,  मगर ये पथ आसान नहीं लगता।          -आस्था गंगवार © 

शबनमी रोशनी की कुछ बूंदें 

श्वेत, सर्द आनन्दमय  चाँद की मोहब्बत भरी रात  या कहूँ दर्द भरी रात  इस चमकीली रात में  बूँद बूँद झरती चाँदनी  जहां चाँद से जुदा होती  सुदूर धरती पर कहीं जाकर  दर -ब -दर ठिकाना ढ़ूढ़ती  कभी घास पर जा बैठती  कभी फूलो की पंखुड़ियों पर सजती  दूर धरा से चाँद को निहारती  होकर रागमयपढ़ना जारी रखें “शबनमी रोशनी की कुछ बूंदें “

अब ये पंछी कहाँ रहेगे। 

अब ये पंछी कहाँ रहेगे  मधुवन की तलाश में कहाँ फिरेंगे  तिनका-तिनका जोङ जोङकर  उसने अपना महल बनाया  एक वृक्ष की शाखा तले  फिर उसको लटकाया  बिन आंधी तूफान के  उनके घरौंदे तोङो ना  मतवारे इन पंछी को  पिंजरे में पकङो ना  उनके नाजुक पंखो को  जंजीरों में जकङो ना  उन्मुक्त गगन में हर्ष से पढ़ना जारी रखें “अब ये पंछी कहाँ रहेगे। “

हवा के झोंके संग। 

हवा के झोंके संग  खेलती, अठखेलियां करती  लहराये जब जब पताका  लगे ऐसे मुझे जैसे  लहराता हो मेरा मन।  सुनकर मधुर संगीत  झंकृत होते झोंको की धुन पर  मुस्कुराये कलियाँ, फूल  शाखाएं, पर्ण डोले ऐसे  जैसे डोलता हो मेरा मन।  गगन भी खुशी से  नीला सफेद हुआ जाये  ढलती शाम के झरोखे में  बादलों केपढ़ना जारी रखें “हवा के झोंके संग। “